11
Sep

भ्रष्टों पर धावा: एक इलेक्ट्रीशियन ने लगायी आग

Sanjay addresses women NREGA labourers

‘इ बार डीलरबा के बरा मार-मारबइ. एत्ते मारबइ की बुखार लगा देबइ. दवाई भी खिलबइ ..अ फेरु मारबइ. उ जब तक राशन ठीक से न देतइ, तब तक मारबइ!’. ये हैं चन्द्रकला देवी. मुजफ्फरपुर जिले के महंत मनियारी गाँव के एक महिला मजदूर जो समाज परिवर्तन शक्ति संगठन के केंद्रीय समिति की एक सदस्य कुछ ही दिन पहले बनी है. आज संगठन के मजदूरों की मीटिंग है. करीब 30-40 गरीब महिलायें एक छोटे से कमरे में जमीन पर बैठी हुई हैं. सभी अपना-अपना शिकायत संजय को सुना रही है. संजय उनकी समस्यायें का कोई न कोई निदान बता देते हैं. ‘हाँ, उ गाछी वाला काम का पैसा आने वाला है. तीन-चार दिन के बाद पोस्ट-ऑफिस में पता लगा लीजियेगा’. दिन भर इन गरीब महिलाओं का आना-जाना लगा रहा है. सब को संजय भइया से कुछ न कुछ काम था. आख़िरकार संजय ने यह संगठन उन्ही के समस्याओं के निदान के लिए बनाया है. अब उन्हें कोई छोड़ने वाला भी नहीं. दिन का खाना खाने का भी फुरसत इनको नहीं मिलता.

मीटिंग के दौरान सभी लोग वज्जिका में बात कर रहे थे लेकिन संजय खड़ी हिंदी में ही जवाब देते. कुछ महिलाओं को तो उनकी हिंदी अच्छे से समझ में भी नहीं आती थी. मैंने संजय को समझाने की कोशिश की मै सीतामढ़ी का रहने वाला हूँ, वज्जिका बिलकुल अच्छे से समझ सकता हूँ. मेरे कारण हिंदी में न बोले. फिर भी संजय हिंदी में ही बोलते रहे.

बाद में पता चला कि वे करीब बारह साल के ही थे तो अपने बाबूजी के साथ दिल्ली चले गए थे. वहां दिल्ली वाली हिंदी ने यह कमाल किया कि अब तो वज्जिका बोलने में भी लड़खड़ा जाते हैं. दिल्ली में बाबूजी मजदूरी करके घर चलाते थे. संजय सातवीं के आगे नहीं पढ़ पाए. जैसे-तैसे कर एक इलेक्ट्रीशियन बन गए. धीरे-धीरे काम भी मिलने लगा. ठीक-ठाक पैसा आने लगा था. जब संजय अपने पैर पड़ खड़े हो गए तो बाबूजी वापस गाँव आ गए. संजय भी हर साल एक-दो बार गाँव चले जाते थे. वो कभी भी गाँव के लोगो से कोई लाइ-लपटाइ में न पड़ते. गाँव में आते, टोला-मोहल्ला में परनाम-पाती करते, थोड़े दिन खेत-खलिहान में बउआते, आम-लीची चाभते और फिर वापस दिल्ली नगरिया में अपने काम पर वापस! एक बार 2011 में ऐसे ही घर आये हुए थे. सवेरे दातून करने अपने बथानी पहुंचे. वहां आस-पास कुछ गाँव के ही अत्यंत गरीब महिलएं आपस में बाते कर रही थी. उन्होंने नरेगा के अन्दर काम किया था लेकिन अभी तक उन्हें मजदूरी नहीं मिली थी. बड़े ही आशा के साथ महीनों काम किया था. अरे सरकारी काम है आज न कल पइसा मिल ही जायेगा. लेकिन महीनों इन्तजार के बाद भी कुछ नहीं हुआ तो वे जहाँ भी जाती सबको यही दुखड़ा सुनाती. संजय को भी सुनाई. उन्हें अच्छा नहीं लगा लेकिन वे क्या कर सकते थे?

कुछ दिनों बाद संजय फिर दिल्ली वापस काम पर आ गए. यहाँ उन्होंने एक छोटा सा दूकान भी भाड़े पे ले रखा था. दिन भर यहीं ख़राब पड़े बिजली के सामानों की पेंच ढीली करने में लगा रहते. किसी कस्टमर का फ़ोन आया तो घर जाकर भी काम कर देते. घर से आने के बाद संजय के मन में अपने गाँव के नरेगा मजदूरों को पैसा न मिलने वाली बात हमेशा दिमाग में घूम रही थी.

उनके दुकान के सामने ही एक सरदार जी का साइबर-कैफ़े था. उन्होंने कंप्यूटर के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था. जबरदस्त यन्त्र है. दुनिया की सारी जानकारी होती है इसके अन्दर. नरेगा योजना के बारे में भी तो कुछ न कुछ बताएगा ही. यही सोच वो घुस गए साइबर-कैफ़े के अन्दर. आज तक जिंदगी में कभी भी उन्होंने कंप्यूटर नहीं चलाया था. बतौर इलेक्ट्रीशियन, एक दो बार मरे हुए कंप्यूटरों में बिजली रूपी जान फूकने का काम भले ही किया हो, लेकिन जिन्दा कंप्यूटर पर काम करने का मौका कभी नहीं मिला था. टाइपिंग तक भी कभी नहीं की. इसलिए थोड़ी देर तक वह बस लोगों को देखता रहे -–समझने की कोशिश कर रहे था कि लोग करते क्या हैं कंप्यूटर पर. जब उन्हें लगा कि उन्हें भी थोड़ा टिप-टाप करना चाहिए, तो पहुँच गए सरदार जी के पास और बोले: ‘ अंकलजी, मुझे भी कंप्यूटर इस्तेमाल करना है!’

सरदार जी तो उन्हें देखते ही समझ गए थे कि उन्हें कंप्यूटर चलाना तो आता नहीं है. संजय सरदार जी को मनाने में लग गए पर वे वही रत लगाते: ‘अरे, बेटे. तेरे को चलाना तो आता नहीं. सब ख़राब कर दोगे. कोई खेलने की चीज नहीं ये. यें भई! नहीं समझे? संजय कहाँ मानने वाले थे. वहां डटा रहे. अंत में सरदार जी ने हार मानी और झल्लाते हुए संजय को एक कंप्यूटर के सामने बैठा दिया. अब संजय वहां खड़े-खड़े जो भी सीखा उसको इस्तेमाल करने की कोशिश करने लगे. उन्होंने देखा था कि जब भी कोई गोल चकरी (जी हैं, गूगल बाबा!) के अन्दर टाइप करता है तो उससे बहुत सारी जानकारी मिलती है. कंप्यूटर पर पहले से ही गोल चाकरी वाला पेज खुला हुआ था. वे धीरे-धीरे नरेगा टाइप किये. पलक झपकते ही बहुत सारे लिंक्स आ गए. उन्हें ज्यादा कुछ तो समझ नहीं आ रहा था लेकिन जहाँ कहीं भी नरेगा दिखता फटाफट क्लिक पे क्लिक कर देते. जब बीस-बीस बार भी क्लिक करने से कुछ नहीं हुआ तो वो थोड़ा रुके, और दायीं के बदले बायीं वाली क्लिक किये. इस बार तो खुल गया.

भारत सरकार की नरेगा की ऑफिसियल वेबसाइट उनके सामने थे. मजदूर लोग मिटटी काटने में लगे थे और एक कोने में गांधीजी का छूटंकी सा फोटो मजदूर लोगों को टुकुर-टुकुर ताक रहा था. संजय अपना क्लिक-कलैक करते रहे. अंगेजी का कोई खास ज्ञान भी नहीं था. बहुत मुश्किल से ‘district’ और ‘panchayat’ पढ़ पाए. बहुत देर तक क्लिक फिर ‘बैक’..क्लिक फिर ‘बैक’ का खेल खेलते रहे. खेलते-खेलते एक बार उनके पंचायत के किसी योजना वाली एक दस्तावेज खुल गयी. सब कुछ हिंदी में लिखा हुआ था. संजय एकदम खुश! पहला नाम ही उनके घर के बगल वाले काका का मिल गया. संजय का तो ख़ुशी के मारे बुरा हाल था. पहली बार कंप्यूटर हाथ लगा और उन्होंने महेंद्र काका का नाम ढूंढ लिया. उन्होंने कहाँ काम किया, कितना दिन काम किया, कितना पैसा मिला, सब कुछ लिखा था उसपर. पहुँच गए फिर सरदार जी के पास, प्रिंट-आउट ले लिए पूरे लिस्ट का. करीब 300 रुपया लग गया इन सब में. सरदार जी खुश! बंदा पहली बार आया है इतने रूपये का प्रिंट आउट ले गया!

अगले दिन सवेरे सरदार जी के दुकान खोलने से पहले ही संजय वहां हाजिर थे. अब तो गोल चकरी की लत लग गयी थी. सरदार जी संजय को देख हैरान हुए. ‘ आज फिर बैठोगे क्या?’ संजय अब धीरे-धीरे नरेगा वेबसाइट कैसे काम करती है समझने लगे थे. उन्होंने अपने पंचायत के अन्दर पिछले 1-2 साल में जो भी काम हुए थे सब का प्रिंट-आउट लेने लगे. हज़ारों पेज प्रिंट करवा लिए. करीब दस हज़ार का बिल बन गया. उन्होंने सरदार जी को चार हजार रूपये दिए और बाँकी बाद में देने का वादा किया. सरदार जी भी मान गया.

संजय घर लौट कर एक-एक कर सारे दस्तावेजों को पढने में लग गए. उसके बीवी-बच्चों को कुछ नहीं समझ आ रहा था कि आखिर हो क्या रहा है. इतने सारे कागज के बंडलों को देख संजय की पत्नी चौंकी. ‘ इ सब क्या है जी? आप तो इलेक्ट्रीशियन हैं. इ कागज-पत्तर लेकर क्या कर रहे हैं आज-कल?’ संजय ने बताया कि उसे गाँव जाना होगा इन कागजों को पहुँचाने. अपने बीवी को कैसे भी बहला-फुसलाकर वे गाँव पहुँच गए. गाँव पहुँचते ही महेंद्र काका से मिलने गए. पता चला कि उन्होंने तो कभी काम ही नहीं किया है नरेगा के अन्दर. उन्होंने और भी मजदूरों से बात की जिनका नाम उसे नरेगा के वेबसाइट पे मिला था. हर जगह यही पता चला कि या तो लोगों ने काम ही नहीं किया था या उन्हें आज तक कोई भी पैसा नहीं मिला. संजय को लगने लगा कि बहुत बड़ा घपला हुआ है उनके पंचायत में.

मुखिया जी को भी भनक मिली. तुरन्त घर पहुँच गए और संजय के बाबूजी को धमकाने लगे.

‘देख ले अप्पन बेटा के! कथी सब करे में लागल हउ. हमरा से कोनो शिकायत हउ? इंदिरा आवास के पैसा देलीअउ कि न? फेर तोहर बेटा हमरा पीछे काहे लग गेल हउ? समझा ले ओकरा! केतना अच्छा दिल्ली में काम करइत रहलउअ.’

उनके बाबूजी डर गए. उनको भी नहीं पता था कि उनके बेटे ने ऐसा क्या कर दिया कि मुखिया का पारा इतना गरम हो गया. घर का माहौल ख़राब होते देख संजय वापस दिल्ली चले गए लेकिन उनके दिमाग में तो अब भी यही सब घूम रहा था. फिर पहुँच गए सरदार जी के साइबर-कैफ़े. एक बार फिर से गोल चकरी पर टिप-टाप किया और उन्हें कुछ फ़ोन नंबर मिल गए जिनसे नरेगा सम्बंधित जानकारी पता किया जा सकता था. फ़ोन करने पर पता चला कि वह आदमी अब नरेगा पर काम करना छोड़ दिया है. लेकिन उसने संजय को निखिल डे का नंबर दे दिया. संजय को क्या पता निखिल डे किस हस्ती का नाम है. उसे क्या पता कि वो राजस्थान में लाखों मजदूरों का हक़ दिलाने के लिए वर्षों से काम कर रहे हैं और देश के एक बहुत बड़े सामाजिक कार्यकर्ता हैं. फटाफट फ़ोन लगाया ‘ आप निखिल डे बोल रहे हैं? सर, आपसे नरेगा के बारे में बात करना है’. निखिल किसी मीटिंग में व्यस्त थे, एक हफ्ते बाद फ़ोन करने को बोले. तब तक संजय क्या करे? फिर गाँव के लिए रवाना. उसके बीवी को कुछ समझ नहीं आ रहा था. ‘ अभिये घर गए थे आप चार दिन पहले. क्या हो गया है आपको? इ जब से कागज-पत्तर के चक्कर में पड़े हैं तब से आपका दिमाग फिर गया है’. ‘मैं दो दिन के अन्दर वापस आ जाऊंगा’. यह आश्वाशन देकर वे किसी तरह गाँव पहुंचे. उन्हें देख बाबूजी का दिमाग चकराया. ‘रे तोरा की हो गेलउ अ? फेर गाँव में हंगामा करे आ गले?’

मुखिया के गीदर-भभकी से थोडा तो संजय भी डर गया थे. साथ में उसके कारण बाबूजी भी परेशान  हो रहे थे. इसलिए, संजय ने इस बार गाँव के चार-पांच दोस्तों को साथ में लिया और किसी दूसरे गाँव में मजदूरों से बात करने निकल पड़े. सोचा वहां चुप-चाप बात करके पता लगा जायेगा कि क्या सचमुच मजदूरों को पैसा नहीं मिला है. गाँव में पहुँचते ही लोगों की भीड़ इकठ्ठा होने लगी. सब के पास शिकायत थी. किसी को ढंग से पैसा नहीं मिला था. लोगों को लगा की कोई सरकारी कर्मचारी आया है. भीड़ बढ़ते देख संजय के दोस्त लोग धीरे-धीर खिसकने लगे. बाद में संजय अकेले ही लोगों से बातें करते रहे. मुखिया जी भी खबर मिलते ही फिर से आ पहुंचे. इस बार तो गुस्से से तमतमा रहे थे. कुछ लफंगे भी उनके साथ थे. लग रहा था की मार-पिटाई हो जायेगी.

‘ सनक गेल है इ लड़का. सबके बरगला रहल हइ. गाँव में लड़ाई हो जतइ.’ यह सब कहते हुए लोगों को भड़काने लगे. संजय को भी इस बार गुस्सा आ गया. उसने सबको सुनाते हुए बोला की अगर मुखिया जी कोई गलत काम नहीं कियें हैं तो इतना परेशान क्यूँ हैं? हम तो बस मजदूर लोगों से बात करे रहे हैं. आसपास के लोग सब संजय की बात में हामी भरने लगे. यह देख मुखिया जी का माथा ठनका. समझ गए की इतने लोगों के बीच संजय का कुछ नहीं बिगाड़ सकते. यह सब तो हो गया लेकिन संजय को भी समझ नहीं आ रहा था कि आगे क्या करना है. घर के लोगों के दबाव के कारण फिर वापस दिल्ली चले आये. नरेगा सम्बंधित दस्तावेज को कुछ दोस्तों को दे दिए और उनसे बोले कि आस-पास के लोगों से किसी भी तरह धीरे-धीरे पता लगते रहे की उनको सरकारी कागज के अनुसार पैसा मिला या नहीं.

दिल्ली पहुँच कर फिर से निखिल डे को फ़ोन लगाया. इस बार भी वे कहीं व्यस्त थे. बाद में कभी फ़ोन करने को बोले. संजय हर 1-2 दिनों में अपने दोस्तों से बात करते कि उन्होंने काम को आगे बढाया की नहीं. वे लोग अशवाशन देते रहे लेकिन कोई कुछ नहीं कर रहा था. संजय फिर कुछ दिनों के लिए गाँव आ गए. फिर वही कहानी. मुखिया की धमकी कि तुम ये सब के चक्कर में न पड़ो नहीं तो खामियाजा भुगतना होगा. संजय फिर मन मसोस कर दिल्ली वापस आ गए. फिर से निखिल डे को फ़ोन लगाया. इस बार निखिल दिल्ली में ही थे. संजय को मिलने के लिए बुलाया. संजय फटा-फट निखिल के ऑफिस पहुंचे. सारी कहानी सुनाई और पूछा की इस स्थिति में क्या किया जा सकता है. लोगों को पैसा कैसे मिलेगा?

निखिल डे का दिमाग चकराया! एक सातवीं पास आदमी जिसे कंप्यूटर चलाना भी नहीं आता था, इन्टरनेट से इतनी सारी जानकारी इकठ्ठा कर गाँव में हंगामा मचाया हुआ है! इस देश के लाखों लोग सबकुछ जानते-बुझते हुए भी अपना दूम सुटकाये हुए बैठे रहते हैं की कौन जाएगा इन सब में खतरा-मोल लेने. निखिल बहुत प्रभावित हुए संजय के साहस को देख कर. उन्होंने बोला कि उसके पंचायत में जांच होनी चाहिए. उसने बिहार सरकार के एक ऑफिसर का नंबर दिया और बोला की उनसे बात करो और जाकर मिलो. तुम्हारी सहायता करेंगे. अगले दिन ही संजय उस नंबर पे फ़ोन किया और उनसे मिलने का दिन भी तय हो गया. उसे क्या पता था की वह जिनसे बात कर रहा था वो ग्रामीण विकास विभाग के प्रधान सचिव थे. अगर पता भी होता तो फिर भी संजय को प्रधान सचिव कितना शक्तिशाली पोस्ट है उसका अंदाजा लगाना मुश्किल था. प्रधान सचिव की निखिल से इस बारे में पहले ही बात हो गयी थी. उन्होंने अपने एक ऑफिसर को संजय को रेलवे स्टेशन से लाने भेजा. मिलने पर संजय के पंचायत में कल ही जांच करवाने के लिए टीम भेजने की बात करने लगे. संजय ने एक चिट्ठी निकली जो कि उसने निखिल के सहायता से लिखा था. उसमे आधिकारिक जांच करवाने से पहले गाँव में नरेगा सम्बंधित जानकारी दीवालों पर लिखना और सामाजिक आकेंक्षण की मांग थी.

यह सब करके संजय पटना से अपने गाँव उसी रात वापस आ गए. अगले दिन तो कुछ नहीं हुआ लेकिन 1-2 दिनों के अन्दर ही विभाग के द्वारा पंचायत भवन की दीवालों पर लिखाई शुरू हो गयी. मुखिया का दिमाग ठनका. संजय से चाय की दूकान पर मिला और अब बड़े प्यार से समझाने-फुसलाने की कोशिश करने लगा. ‘ तोरा जे चाही से बता दे, लेकिन इ सब बंद करवा दे’. लेकिन संजय कहाँ मानने वाले. वे तो पंचायत भवन के बजाय हर गाँव में लिखाई करवाना चाहते थे ताकि दूर-दराज के गाँव के लोग भी पढ़ पायें. जब जिला के कर्मचारी लोग संजय के इस सुझाव को ठुकरा दिया तो संजय ने प्रधान सचिव को फ़ोन लगायी. प्रधान सचिव ने सीधे मुजफ्फरपुर के डीएम  से बात की, और फिर डीएम ने अपने से नीचे के अधिकारी को फटकारा और काम आसानी से हो गया.

बाद में जांच करने वाली टीम भी आई. मुखिया जी तो पहले से ही गुस्से में थे. गुंडे-लफंगों से लैस ग्राम सभा में पहुँच गए. संजय कुछ बोल पाते की उससे पहले ही माहौल बहुत खराब हो गया था. उनके एक साथी राम कुमार की पिटाई भी होने लगी. संजय वहां से खिसकने में ही भलाई समझी. लेकिन फिर फ़ोन लगा दिया प्रधान सचिव को और सारी जानकारी दे दी. इस बार प्रधान सचिव ने एक स्पेशल टीम का गठन किया जो इस बार पुरी तैयारी से गयी फिर भी उनके जांच से कुछ खास बदलाव नहीं आया. लेकिन यह सब होते देख वहां के मजदूर अब संजय पर विश्वास करने लगे थे . संजय भी उन्हें संगठित कर नरेगा के अन्दर काम के लिए आवेदन दिलवाने लगे और उनको अपनी हक़ की लड़ाई लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया. मुखिया और सरकारी कर्मचारी जब भी बीच में अड़ंगा डालते तो संजय के नेतृत्व में मजदूर लोग इकठ्ठा होकर धरना देने लगे. जब सब कुछ कर लेने पर भी जिला के अधिकारी न सुनते तो संजय प्रधान सचिव को फ़ोन लगा देते जो कि तुरंत डीएम को फटकार लगाते.

जो भी हो, जैसे भी हो लेकिन संजय के काम से उसके पंचायत के गरीब मजदूरों के जीवन में बदलाव आने लगा. जिस पंचायत में बस कागजों पर ही काम हो रहा था, वहां के लोग अब एक साथ मिलकर काम की मांग कर रहे हैं. काम नहीं मिलने पर या मजदूरी मिलने में देरी होने पर मुखिया पर दबाव डालना, ब्लाक में शिकायत करना, धरना देना अब इनके जिंदगी का एक हिस्सा हो गया है.

संजय ने इस संगठन का शुरू में नाम रखा ‘बिहार मनरेगा वाच’ (BMW) (जब उसे पहली बार पता चला की BMW एक कार कंपनी है तो जानकर खूब हंसा). अब धीरे-धीरे अन्य समस्याओं के बारे में भी काम शुरू हो गया है. जैसे राशन देने में डीलर के मनमानी को रोकना, पेंशन योजना के लाभ को बुजुर्ग या विधवा मजदूरों तक पहुँचाना. जब एक बार लोग संगठित हो जाते हैं तो फिर उनका हक़ छिनना बहुत मुश्किल हो जाता है. संजय के पंचायत की कहानी जैसे ही दुसरे गाँवों के मजदूरों के पास पहुंची, वे सब भी अपनी शिकायत लेकर संजय के पास पहुंचने लगे. इस तरह संगठन का काम बढ़ने लगा और अब तो करीब 25 पंचायत के करीब दस हजार मजदूर इससे जुड़ गए हैं.

मैं संजय के साथ दो दिन गुजारा और उन्हें दिन भर एक ही काम करते हुए पाया. किसी मनरेगा मजदूर की समस्या सुनना और उसकी बात ख़तम हो उससे पहले ही उसका जवाब दे देना

‘संजय भइया, हम्मर पइसा न अलइ अ?’

हाँ, रास्ता में है पैसा. आप एक सप्ताह के बाद पोस्टमॉस्टर से मिलेंगे.

‘हे हम्मर बैंक में अकाउंटे न खोल रहल हइ. कहैछई जॉब कार्ड के फोटो पर स्टाम्प न हइ’.

रोजगार सेवक को बोल देंगे. आप कल सवेरे फ़ोन कर के एक बार याद दिलाएंगे.

‘मुखिया के गेल रहल ही काम देबे लगी कहे लेकिन बहुत गन्दा-गन्दा गाली देलक. कहलक नुआ उघार के मारबउ तोरा सबके. इ संजइया सब के माथा ख़राब कैले हउ’.

इ मुखिया को ठीक करना होगा. आप अकेले नहीं जाइए उसके पास. आपके गाँव के सब मजदूर एक साथ उसके घर पहुंचेंगे. फिर देखते हैं क्या कर लेता है. पिछली बार उसको घेरे थे तो पैर पे गिरने का नाटक करने लगा. फिर से ठीक करना होगा उसको!

किस पंचायत में किस योजना में क्या हो रहा है, कहाँ पैसा पहुंचा है, कौन रोकने की कोशिश कर रहा है, किस पर दवाब डालना है सब कुछ उनके दिमाग में एक एक्सेल फाइल की तरह रखा मालूम पड़ रहा था. बीच-बीच में नरेगा कर्मचारियों से फ़ोन पर भी बात करते रहते थे और नयी जानकारियों को तुरंत ‘अपडेट’ कर देते थे.

‘आवाज दे’ संस्थान ने संजय के लिए एक मोबाइल रेडियो की व्यवस्था कर दी है. जब भी संगठन के मजदूरों को कोई जानकारी देनी होती है तो संजय मोबाइल पर अपनी बात रिकॉर्ड कर के भेज देतें है और वह खुद-ब-खुद सबके पास पहुँच जाती है. अगर कहीं धरना देना हो या किसी मीटिंग के लिए मजदूरों को बुलाना हो, संजय के लिए उनका मोबाइल ही काफी है. मजदूरों को भी बड़ा मज़ेदार लगता है. मैं जब संजय के साथ एक मनरेगा के एक कार्य स्थल पर पहुंचा तो तीन-चार महिलायों ने संजय को घेर लिया और बोलने लगी ‘ हे, संजय बउआ, हम्मर मोबाइल में भी रेडी डाल दा.’ संजय बारी-बारी से सबके मोबाइल को रजिस्टर करने लगे. उन मजदूरों के चेहरे एकदम खिल गए. अब दूसरों के जैसे उनके लिए भी फ़ोन आएगा. संजय भइया का. ‘ हम जानेंगे, हम जियेंगे! पिछले साल किसी भी मजदूर भाई-बहनों को पुरे 100 दिन का काम नहीं मिला. हम बेरजोगरी भत्ता के लिए आवेदन भरेंगे. आप अपना आवेदन फार्म लेकर जल्द ही SPSS ऑफिस में संपर्क करें’.

अब तो संजय बहुत ‘फेमस’ हो गए हैं. बहुत सारा अवार्ड्स मिला है पिछले 1-2 सालों में. सत्यमेव जयते में भी उनकी जिंदगी की कहानी दिखाई गयी. संजय दिल्ली में होकर भी नहीं देख पाए. बिजली गायब थी उस दौरान. लेकिन गाँव में तो यह खबर बिजली की तरह फैल गयी. अखबार के भी मुख्य पृष्ठ पर यह खबर छपी थी ‘ मुजफ्फरपुर का हीरो आज दिखेंगे आमिर खान के प्रोग्राम में!’ गाँव में भी लोग एक दुसरे को बोल रहे थे ‘ हे, इ अप्पन संजय के टीवी में आबे बला हइ’. इन सब के बावजूद, संजय के माँ-बाबूजी अपने बेटे को टीवी पर नहीं देख पाए. अभी भी एक टूटे-फूटे झोपड़ी में रहते हैं. टीवी नहीं है उनके घर पर. संजय जब गाँव आया तो अपने लैपटॉप से ‘you-tube’ पर दिखलाया उन्हें. देखने के बाद उन लोगों ने कुछ नहीं बोला. शायद अपने ख़ुशी को इजहार नहीं करना चाह रहे थे. उसके बाबूजी करीब पांच मिनट तक चुप-चाप रहने के बाद बोले ‘ लेकिन आमिर खान ने तो तुमसे बात नहीं किया टीवी पर!’.

इस काम से गरीब मजदूरों के जीवन में तो जरूर बदलाव आया है और संजय ने भले ही खूब नाम कमाया हो, लेकिन उसका इलेक्ट्रीशियन वाला काम एकदम चौपट हो गया है. हर महीने वो एक-आध सप्ताह के लिए दिल्ली काम करने जाते तो हैं, लेकिन उनका दिमाग तो गाँव में ही अटका रहता है. इसके फलस्वरूप अब कस्टमर्स बहुत कम हो गए हैं. आर्थिक तंगी हमेशा बनी रहती है. जब बच्चों को स्कूल भेजना भी मुश्किल होने लगा था तो निखिल ने किसी संस्थान की ओर से संजय के लिए कुछ आर्थिक सहायता करवाई. न्यूनतम मजदूरी के हिसाब से कुछ पैसा मिल जाता है. लोगों की सेवा में इतना रम गएँ हैं की अपनी कमाई को बढाने में अब उतना मन ही नहीं लगता है.

यह बात उनको बार-बार कचोटती है. पूरा समय उनको गाँव में ही मजदूरों के बीच ही गुजारने का मन करता है लेकिन इन सब से घर-बार कैसे चले? आधे-अधूरे मन से इलेक्ट्रीशियन वाला काम करने का नाटक भी करने से पर्याप्त आमदनी तो होती नहीं. बहुत सारे जाने-अनजाने शुभचिन्तक बीच-बीच में आर्थिक सहयोग जरूर करते रहते हैं लेकिन वो सारा पैसा संगठन में ही चल जाता है. अब अपनी जिंदगी चलाने के लिए भी दुसरे के भरोसे तो नहीं छोड़ सकते. यही सवाल मेरे से भी पूछा. मैं भला क्या जवाब देता?

मै तो अपने आप से ही सवाल करने में लगा था. इतना सब कुछ होने पर भी कुछ नया करने से क्यों डरता हूँ? मैं तो अपने अन्दर मरे संजय को जगाने में लग गया था.

— चिन्मय कुमार.

Post a Comment