हमारा इतिहास

हमारा इतिहास:

समाज परिवर्तन शक्ति संगठन (SPSS) का आरंभ अपने पंचायत में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा या मनरेगा) मंे व्याप्त भ्रष्टाचार को सामने लाने के लिए एक व्यक्ति के जबर्दस्त भावावेश से हुआ। सातवीं कक्षा मंे पढ़ाई छोड़ चुके संजय सहनी उस समय दक्षिण-पश्चिम दिल्ली स्थित जनकपुरी की गलियों मंे बिजली मिस्त्री का काम करते थे। अब भावावेश का विस्तार व्यक्ति से गांव तक, गांव से पंचायत तक, पंचायत से प्रखंड तक और अंततः पूरे मुजफ्फरपुर जिले मंे तो हो ही चुका है, पड़ोसी जिले मंे भी फैल चुका है जिसके दायरे मंे कोई 10 हजार मजदूर आते हैं। संगठन अब भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक व्यक्ति का धर्मयुद्ध नहीं, एक जनांदोलन है जो नागरिकों के बीच अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए संघर्ष करता है।

अगस्त 2011 में संजय सहनी की इंटरनेट के बारे मंे संयोगवश मिली जानकारी के साथ अनेक अन्य तथ्यों से भी साक्षात्कार हुआ। पहली बार विश्वव्यापी संजाल (वल्र्डवाइड वेब) तक पहुंच के कुछ ही दिनों के अंदर संजय को समान महत्व की चीजों का पता चल गया था – कि उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों और भ्रष्ट नौकरशाहों के गंठजोड़ ने गांव के लोगों के नाम पर लाखों रुपए डकार लिए थे। नरेगा के तहत काम के लिए सरकार के प्रतिनिधि से संपर्क करने वाले किसी भी परिवार को 100 दिनों का रोजगार देने का वादा किया गया है। संजय के गांव रतनौली में मजदूरों ने योजना का नाम भर ही सुना था। काम के लिए तो शायद ही किसी को कहा गया था। और इसके बावजूद आॅनलाइन सरकारी दस्तावेजों के अनुसार अनेक लोगों ने मिलकर कई-कई दिनों तक काम किया था। उससे भी बड़ी बात यह है कि उन्हें भुगतान किया गया था और उनके खातों से रकम निकाल ली गई थी।

दिल्ली से रतनौली की संजय की तत्काल यात्रा ने उनके भय की पुष्टि कर दी। अधिकांश दस्तावेज कपटपूर्ण थे।

संजय ने तत्काल नरेगा के वेबसाइट (www.nrega.nic.in) के लोगों से सपंर्क करना शुरू किया। सौभाग्यवश, कुछ महीने बाद उन्होंने अपनी कहानी ‘नेशनल कैंपेन फाॅर द पीपल्स आॅफ राइट टू इनफार्मेशन’ (एनसीपीआरआइ) के निखिल दे को बताई। निखिल दे ने उन्हें बिहार सरकार के ग्रामीण विकास विभाग के प्रधान सचिव श्री संतोष मैथ्यू के पास भेजा। संतोष मैथ्यू ने शिकायत मिलने के एक सप्ताह के अंदर ही रतनौली में अंकेक्षण कराया। संजय द्वारा नरेगा वेबसाइट तक पहुंचने के कोई चार महीने बाद अंकेक्षण दल पटना से मुजफ्फरपुर पहुंचा और उसने असहज कर देने वाले अनेक प्रश्न पूछे। रतनौली के अनेक लोगांे ने अपने जीवनकाल में वस्तुतः पहली बार पटना से आए हुए सरकारी अधिकारियों को देखा था। उनकी नजरों में संजय कभी-कभार आने वाले सामान्य व्यक्ति से स्थानीय नायक बन गए थे।

अपनी सफलता के बाद संजय के प्रयास थम नहीं गए। उन्होंने जागरूकता बढ़ाने में मदद के लिए व्यक्तियांे के एक दल का निर्माण शुरू किया। और जल्द ही बिहार मनरेगा वाच (बीएमडब्ल्यू) का जन्म हुआ जो पहले-पहल रतनौली और उसके पड़ोसी पंचायत महंत मनियारी में मरेगा के क्रियान्वयन का अनुश्रवण करता था। अगर मनरेगा के तहत मजदूरों को काम दिया जाना था – जिसके लिए यह योजना तैयार की गई थी – न कि मुखिया और उसके लगुओं-भगुओं के हाथों में अतिरिक्त संपदा का संकंेद्रण, तो लोगों को जानना जरूरी था कि उनके नाम पर क्या चल रहा है और वे किस चीज के हकदार हैं। बिहार मनरेगा वाच ने रतनौली और पड़ोसी पंचायत महंत मनियारी में अनेक ‘जागरूकता’ सभाएं कीं। सभाओं के प्रति अन्य पंचायतों के लोग भी आकर्षित हुए और आमसभा मैदान का नाम बदलकर ‘नरेगा चैक’ कर दिया गया। इन सभाओं की अंतर्वस्तु जागरूकता बैठकों की थी। बहरहाल, अनेक चीजें साथ-साथ होती दिखती हैं। रणनीतियां तैयार की गई, काम के नए रास्तों और उनके विस्तार की पहचान की गई। कामगारों को राज्य से मौखिक और आावेदन के जरिए, दोनो तरह से काम मांगने के लिए प्रशिक्षित किया गया जो नरेगा के तहत उनका अधिकार था। जल्द ही बीते दिनों के विपरीत, योजना में वास्तविक कामगार काम करने लगे और ऐसा करते हुए उनलोगों ने 15 दिनों के अंदर भुगतान करने की मांग की जैसा कि अधिनियम मंे वर्णित था। कामगारों में महिलाएं बहुसंख्यक थीं और अब भी हैं। वे कठिन परिश्रम करती थीं। वे सुनिश्चित करती थीं कि काम की माप शिक्षित अभियंता द्वारा की जाय। वे अपनी हाजिरी बनाने के लिए पंचायत रोजगार सेवक (पीआरएस) पर दबाव बनाती थीं। उनलोगों ने अपने बीच से मजदूर-मेट भी बहाल किए थे।

इस प्रकार सड़कांे का निर्माण किया गया, तालाब खोदे गए, जमीन समतल की गई।

शीघ्र ही, जागरूक श्रमशक्ति काम के प्रावधान और भुगतान की स्थिति से असंतुष्ट हो गई। वे मांग करने लगे कि उनका राशन समय से मिले। महंत मनियारी मंे महिलाआंे के एक समूह ने स्थानीय सस्ते गल्ले की दूकान के दूकानदार का घेराव किया और उस पर दबाव दिया कि वह गांव के हर लोग को तीन महीनों से लंबित अनाज उपलब्ध कराए। बूढ़े, निःशक्त और विधवाएं मनमाने ढंग से पेंशन वितरण के बजाय अपने खातों मंे हर महीने पेंशन पाना चाहती थीं। अधिकारों की मांग के लिए सशक्तकारी सूचनाधिकार अधिनियम का भी उपयोग किया गया। अंततः बिहार मनरेगा वाच समाज परिवर्तन शक्ति संगठन का अंग बन गया। यह ऐसा यूनियन था जो महज अनुश्रवण अधिकरण से बढ़कर था। इसने मनरेगा से आगे जाकर काम करने का संकल्प लिया; इसने समाज में परिवर्तन लाने का संकल्प लिया।

समाज परिवर्तन शक्ति संगठन का विस्तार पंचायतों और प्रखंडों मंे होता गया और अंततः 2 जिलों के लगभग 10 हजार मजदूर इसके दायरे मंे आ गए। हर जगह की एक ही कहानी थी। सबसे पहले मुखिया-पंचायत रोजगार सेवक-डाकघर (निवाचित प्रतिनिधि-नौकरशाही-भुगतान अभिकरण) गंठजोड़ को तोड़ा गया, नरेगा के वेबसाइट पर डाली गई सूचना का उपयोग करते हुए भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ किया गया। और उसके बाद मजदूरों ने मांग की और काम हासिल किया तथा समय पर सही भुगतान के लिए आंदोलन किया। सभाएं आयोजित की गईं, समाहर्ता कार्यालय और मुखियों के घरों के समक्ष धरने दिए गए। अधिकारों की मांग की गई, उत्तरों के वीडियो टेप तैयार किए गए, अंकेक्षण आयोजित किए गए, सूचनाधिकार अधिनियम के तहत आवेदन दिए गए। स्थानीय समाचार माध्यमांे का रुख प्रायः सहानुभूतिपूर्ण था जिन्होंने कुछ बड़े आंदोलनों के समाचार प्रकाशित-प्रसारित किए। उदाहरणस्वरूप, समय पर भुगतान के लिए अगस्त 2013 में मुजफ्फरपुर मंे आयोजित आंदोलन से संबंधित समाचार स्थानीय समाचारपत्रों और टीवी के समाचार चैनलों के जरिए प्रचारित-प्रसारित किए गए।

ऐसा नहीं है कि इन सबको निर्वाचित प्रतिनिधियों की प्रतिक्रिया का सामना नहीं करना पड़ा। संगठन के अनेक कार्यकर्ताआंे को डराया-धमकाया गया, कुछ कार्यकर्ता झगड़ा-झंझट में घायल भी हुए। सबसे दुखद घटना यह हुई कि मुखिया के लोगांे द्वारा रतनौली निवासी अधिवक्ता और संगठन के समर्थक रामकुमार ठाकुर की सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई। संगठन के लोगों ने मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार और केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री श्री जयराम रमेश से भी मिलकर सारी बातें बताईं लेकिन मुखिया अभी भी पंचायत मंे रह रहा है। दूसरी ओर, स्वर्गीय ठाकुर के परिजन मुखिया के लगुओं-भगुओं की धमकियों बचते-बचाते लगातार भय के वातावरण में रह रहे हैं।

समाज परिवर्तन शक्ति संगठन मुजफ्फरपुर में ही नहीं, पूरे देश मंे लोगों को प्रेरित कर रहा है। हर जगह परिवर्तन के लिए हो रहे अनेक आंदोलनों में संगठन के स्वयंसेवकों की उपस्थिति रहती है। फरवरी 2014 में ह्विसलब्लोअर विधेयक पारित करने के लिए दिल्ली में हुए प्रतिवाद मंे 200 से अधिक मजदूर शामिल हुए। उनके मोबाइल रेडियो अभियान के तहत मजदूर अपने आसपास की ताजातरीन स्थितियों में बारे मंे अपने सेलफोन पर 2 मिनट का संदेश प्राप्त करते हैं। यह ग्रामीण संगठन को आगे बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग के एक बड़े उदाहरण के बतौर देखा गया है। संगठन ने खुद से सरकारी योजनाओं का सामाजिक अंकेक्षण आयोजित किया है और निष्कर्षों को जिला समाहर्ता के सामने रखा है।

समाज परिवर्तन शक्ति संगठन ने काफी काम किया है लेकिन उसके लिए अभी भी काफी कुछ करना बाकी है। हालांकि यह खास किस्म की आशा बंधाता है – कि संभ्रांत तबके की मामूली सहायता से और संपन्न तबके की सहायता के बिना भी ग्रामीण जनांदोलन स्वाभाविक रूप से विकसित हो सकते हैं; कि न्याय की एक आदमी की आकांक्षा हजारो लोगों के बीच प्रतिध्वनित हो सकती है; कि हजारो लोग मिलकर अत्यंत प्रतिकूल वातावरण में भी अपने अप्राप्त अधिकार पा सकते हैं; कि धरना, याचिका, अभियान आदि पारंपरिक अहिंसक विधियों और इंटरनेट, मोबाइल रेडियो और सेलफोन जैसी आधुनिक प्रौद्योगिकी का उपयोग करके सत्ता का पारंपरिक स्रोत रही भ्रष्ट अफसरशाही को परास्त और बदलने के लिए बाध्य किया जा सकता है। समाज परिवर्तन शक्ति संगठन सरल किंतु उल्लेखनीय उक्ति ‘हम जानेंगे, हम जिएंगे’ के समर्थन मंे परिवर्तन हेतु एक संघर्ष है।